पिछले कई सालों से नेपाल देश में क्रांति जारी है.आज नेपाल राजतन्त्र से लोकतन्त्र में बदल तो गया है ,संविधान की भी घोषणा कर दी गयी है लेकिन फिर भी वहां शांति और राजनितिक स्थिरता दूर-दूर नज़र नहीं आती.इसके कई कारण हैं.एक लंम्बे समय तक खानाजंगी का शिकार रहा इस छोटे और खूबसूरत देश की समस्सयाओं के अंत होने का संभावना ही नज़र नही आता.हर गुज़रते दिन के साथ कोई न कोई नयी समस्सया जन्म ले ही लेती है.एक लम्बे इंतज़ार के बाद देश का संविधान बना तो इस पर पड़ोसी देशों की बुरी नज़र लग गयी.पड़ोसियों ने साथ देने के बजाये इस पर खुद के हितों के अनुसार राजनीति शुरू की.देश के कई भागों में बांटने की पूरी कोशिश की गयी.देश को जाति,धर्म,भाषा और समुदाय में बाटने की नापाक कोशिश की गयी.जिसकी शुरुआत एक लोकतान्त्रिक देश को हिंदू देश बनाने से हुई.जब इस कोशिश पर संसद भवन की मार पडी तो बदले में नेपाल को आर्थिक बंदी का सामना करना पड़ा.नेपालियों ने देश प्रेम के लिए इस ज़हर को भी पी लिया.
जब यहाँ नाकामी हाथ लगी तो संविधान को निशाना बनया गया.इसके बाद नेपाल के दो संसद भवन बन गए.एक काठमांडू में और दोसरा दिल्ली में.दिल्ली संसद भवन की ख़ास विशेषता ये थी की यहाँ पर हर ऐरे-गैरे को संसद भवन की कुर्सी संसदीय भत्ते के साथ दी गयी.नेपाली जनता ने चुनाव में जिन नेताओं को अस्वीकार कर दिया था उन्हें दिल्ली संसद भवन में नुमायाँ कुर्सी दी गयी.अब आप ही बताओ की भारत की नमक हरामी बेचारे जनता के अरमानों पर खरा न उतरने वाले ये नेता कैसे कर सकते थे.
कितनी अजीब बात है कि नेपाल के समस्सयाओं का समाधान दिल्ली में तय किया जाने लगा.भारतीय पैसों पर पलने वाले इन नेताओं को तो देश की राष्ट्रीयता,अखंडता और सार्वभौमिकता की रक्षा भी नज़र न आयी.बिना सोचे समझे ये लोग जनता के बीच आग भड़काने और देश को बाटने की राह पर चल पड़े.बेचारे जोश में होश न रख पाने वाले कई लोग इस आग के शिकार भी हुए.जानें भी उन्हीं लोगों ने गवाई जिनको दिल्ली संसद भवन की हकीक़त नहीं मालूम थी.तभी तो इतने घातक आन्दोलन के बावजूद दिल्ली के सांसदों को पसीना भी न आया.फिर क्या था जगह-जगह सभाएं की गयीं,बॉर्डर ब्लाक किया गया,नेपाली नागरिकों को पानी पानी के लिए तरसाया गया,साउंड के माध्यम से नेपाल में दिल्ली का ज़हर उडेला गया.दर्शक कम पड़े तो भारत से समूह दर समूह भेजे गए.
इसी कारण समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया.मधेसी नेताओं ने खुद की कुर्सी के लिए देश को दावँ पर लगा दिया.बिना सोचे समझे आँख बंद करके भारत सरकार की हर बात मान ली गयी.भारत ने भी अपनी कुछ नीतियों को इसे बहाने पूरा करने की पूरी कोशिश की.हमारे नमक हलाल नेता इसको समझ न सके.जब भारत के नापाक इरादों पर ताला लगाने का प्रबंध किया गया तो भारत भी जिद में आकर नेपाल के हितों और पडोसी संबंधों को दावँ पर लगा कर नेपाली राजनितिक व्यस्था को तहस नहस कर डाला.नेताओं की खरीदो व फरोख्त से भी परहेज़ न किया गया.खरीद व विक्री में मशहूर मधेसी नेताओं ने भी देश के बारे में रत्ती बराबर भी न सोचा.लेकिन भारत यहाँ ये भूल रहा था कि नेपाल में भी देशभक्त बसते हैं.उन्हें भी अपनी इज्ज़त,संस्कृति और सवाभिमान के लिए लड़ना आता है.आखिर में इसी के लिए लड़ा गया जो आज भी जारी है.
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