Thursday, December 22, 2016

नेपाली संविधान मधेश की नहीं बल्कि .. भारत की समस्सया है...!!!

अगर इमानदारी के साथ मधेशी समस्याओं पर विचार विमर्श किया जाये तो यह हकीकत में नेपालियों की कोई समस्या नहीं लगे गी. यह पैदा की हुई ऐसे परेशानी है जिसका परिणाम बहुत भयानक है.इस समस्सया का समाधान भी समस्सया उत्पन्न करने वालों के पास ही मौजूद है.लेकिन वह समाधान नहीं चाहते हैं बल्कि देश चाहते हैं.....हाँ....पूरे देश पर क़ब्ज़ा स्थापित करना चाहते हैं. यह एक सपना है जो कभी पूरा हो ही नहीं सकता.

मधेसी समस्सया भारतीय विस्तारवादी नीति का एक अंग है. भारत ही इस भयानक स्थिति का ज़िम्मेदार है. नेपाल की राजनितिक विफलता और अशांति भारतीय विदेशी नीति का ही देन है. भारत अपने कई नीतियों को नेपाल देश पर थोपना चाहता है.कई वर्षों से वह इस चाल को कामयाब बनाने में लगा पड़ा है. लेकिन अभी तक वह किसी हद तक भी कामयाब न हो सका है. इसकी वजह नेपाली नागरिकों की देशभक्ति है.

आज नेपाल में जो कुछ मधेश के समस्सयाओं पर बात की जा रही है वह वास्तव में मधेशी समस्सया नहीं है बल्कि यह भारतीय विस्तारवादी की समस्सया है. हकीकत यह है की भारत मधेशियों को इस्तेमल कर नेपाल के तराई क्षेत्र को नेपाल से अलग करके एक और सिक्कम बनाना चाह रहा है. इसी विस्तारवादी आवश्यकता अनुसार मधेसी संविधान संशोधन कराना चाह रहे हैं. जो शायद असंभव है. क्यूंकि कोई भी देश ऐसी नीति कभी भी नहीं ला सकता जिससे उसके देश के वजूद को ही खतरा हो.

भारत एक बार फिर अपने नापाक इरादों को जन्म दे रहा है. वह सरदार बल्लभ भाई पटेल की नीति को लागू करना चाह रहा है.विस्तारवादी नीति बल्लभ भाई पटेल का ही देन है. वह हमेशा नेपाल देश को भारत में शामिल करने का इरादा रखते थे. बहुत हद तक वह इसमें कामियाब भी हुए है. क्यूंकि भारत में बहुत सारी जगहें ऐसी हैं जो सौ सालों के अन्दर ही नेपाल हुआ करता थी. भारतीय विस्तारवादी नीति का नमूना देखना है तो आप सिक्कम का इतिहास पढ़ सकते हैं. इस नीति के अंतर्गत भारत नेपाल में बहुत कुछ कर चूका है. अब वह तराई और पहाड़ को अलग करके तराई को नेपाल से अलग कर देना चाहता है. भला आप ही सोचिये नेपाल ऐसे नीतियों का समर्थन कैसे कर सकता है.

आजतक नेपाल में भारतीय विस्तारवादी नीति कैसे कामयाब रही...??? इस के ज़िम्मेदार नेपाल के राजनीतिक दल और राजनेता भी है. नेपाल के राजनितिक दलों में जिस प्रकार नीतिगत कमज़ोरी पाई जाती है उसकी वजह से भारतीय विस्तारवादी नीति को शक्ति मिलती रही है. इसको अति शक्ति प्रदान करने में मधेश्वादी भूमिका हमेशा महत्वपूर्ण रही है. इन्हीं कारण आज नेपाल के राष्ट्रीयता को गंभीर खतरा है. प्रदेश नम्बर पांच का विखंडन इसी नीति को विस्तार देने का एक छोटा सा प्रयास है.जो सिर्फ तराई के लिए नहीं बल्कि पूरे देश के लिए भयानक खतरा है.      

Wednesday, December 21, 2016

मधेश एक समस्या क्यों...???

पिछले कई सालों से  नेपाल देश में क्रांति जारी है.आज नेपाल राजतन्त्र से लोकतन्त्र में बदल तो गया है ,संविधान की भी घोषणा कर दी गयी है  लेकिन फिर भी वहां शांति और राजनितिक स्थिरता दूर-दूर नज़र नहीं आती.इसके कई कारण हैं.एक लंम्बे समय तक खानाजंगी का शिकार रहा  इस छोटे और खूबसूरत  देश की समस्सयाओं के अंत होने का संभावना ही नज़र नही आता.हर गुज़रते दिन के साथ कोई न कोई नयी समस्सया जन्म ले ही लेती है.एक लम्बे इंतज़ार के बाद देश का संविधान बना तो इस पर पड़ोसी देशों की बुरी नज़र लग गयी.पड़ोसियों ने साथ देने के बजाये इस पर खुद के हितों के अनुसार राजनीति शुरू की.देश के कई भागों में बांटने की पूरी कोशिश की गयी.देश को जाति,धर्म,भाषा और समुदाय में बाटने की नापाक कोशिश की गयी.जिसकी शुरुआत एक लोकतान्त्रिक देश को हिंदू देश बनाने से हुई.जब इस कोशिश पर संसद भवन की मार पडी तो बदले में नेपाल को आर्थिक बंदी का सामना करना पड़ा.नेपालियों ने देश प्रेम के लिए इस ज़हर को भी पी लिया.

जब यहाँ नाकामी हाथ लगी तो संविधान को निशाना बनया गया.इसके बाद नेपाल के दो संसद भवन बन गए.एक काठमांडू में और दोसरा दिल्ली में.दिल्ली संसद भवन की ख़ास विशेषता ये थी की यहाँ पर हर ऐरे-गैरे को संसद भवन की कुर्सी संसदीय भत्ते के साथ दी गयी.नेपाली जनता ने चुनाव में जिन नेताओं को अस्वीकार कर दिया था उन्हें दिल्ली संसद भवन में नुमायाँ कुर्सी दी गयी.अब आप ही बताओ की भारत की नमक हरामी बेचारे जनता के अरमानों पर खरा न उतरने वाले ये नेता कैसे कर सकते थे.

कितनी अजीब बात है कि नेपाल के समस्सयाओं का समाधान दिल्ली में तय किया जाने लगा.भारतीय पैसों पर पलने वाले इन नेताओं को तो देश की राष्ट्रीयता,अखंडता और सार्वभौमिकता की रक्षा भी नज़र न आयी.बिना सोचे समझे ये लोग जनता के बीच आग भड़काने और देश को बाटने की राह पर चल पड़े.बेचारे जोश में होश न रख पाने वाले कई लोग इस आग के शिकार भी हुए.जानें भी उन्हीं लोगों ने गवाई जिनको दिल्ली संसद भवन की हकीक़त नहीं मालूम थी.तभी तो इतने घातक आन्दोलन के बावजूद दिल्ली के सांसदों को पसीना भी न आया.फिर क्या था जगह-जगह सभाएं की गयीं,बॉर्डर ब्लाक किया गया,नेपाली नागरिकों को पानी पानी के लिए तरसाया गया,साउंड के माध्यम से नेपाल में दिल्ली का ज़हर उडेला गया.दर्शक कम पड़े तो भारत से समूह दर समूह भेजे गए.

इसी कारण समस्याओं का समाधान नहीं हो पाया.मधेसी नेताओं ने खुद की कुर्सी के लिए देश को दावँ पर लगा दिया.बिना सोचे समझे आँख बंद करके भारत सरकार की हर बात मान ली गयी.भारत ने भी अपनी कुछ नीतियों को इसे बहाने पूरा करने की पूरी कोशिश की.हमारे नमक हलाल नेता इसको समझ न सके.जब भारत के नापाक इरादों पर ताला लगाने का प्रबंध किया गया तो भारत भी जिद में आकर नेपाल के हितों और पडोसी संबंधों को दावँ पर लगा कर नेपाली राजनितिक व्यस्था को तहस नहस कर डाला.नेताओं की खरीदो व फरोख्त से भी परहेज़ न किया गया.खरीद व विक्री में मशहूर मधेसी नेताओं ने भी देश के बारे में रत्ती बराबर भी न सोचा.लेकिन भारत यहाँ ये भूल रहा था कि नेपाल में भी देशभक्त बसते हैं.उन्हें भी अपनी इज्ज़त,संस्कृति और सवाभिमान के लिए लड़ना आता है.आखिर में इसी के लिए लड़ा गया जो आज भी जारी है.

मधेशवानी....!!!!!!

एक बार फिर नेपाल देश कठिनाईयों के दौर सा गुज़र रहा है.संविधान बनने के बाद भी कुछ समुदाय संविधान के विरुद्ध संघर्ष कर रहे हैं.पिछले वर्ष चार महीने की आर्थिक बंदी सहने के बाद एक बार फिर नेपाल में आमजीवन असामान्य नज़र आने लगा है.ऐसा महसूस होता है की नेपाली जनता एक बार फिर तहस नहस का शिकार होने वाली है. पूरा देश कुछ लोगों के मन के अनुसार जीवन गुज़ारने पर मजबूर है.कुछ राजनेताओं के रहम-व-क्रम पर इस देश का भविष्य निर्भर दिखाई पड़ता है.एक बार फिर मधेसी नेता झूठ और मक्कारी का सहारा ले कर मासूम जनता को बेवकूफ बना रहे हैं.अपने नापाक और देश विरुद्ध नीति में असफल रहने के बाद दोबारा इसको सफल बनाने की कोशिश फिर से शुरू की जा रही है.ता.मा.लो.पा. अध्यक्ष श्री महंत ठाकुर का कपिलवस्तु दौरा और जगह जगह जनसभा करके मदद की गुहार लगाना इसका पुख्ता सुबूत है.दलित और जनजाति समुदाय के नाम का परंपरागत प्रयोग इनके जनसभाओ का अंग बनता दिखाई पड़ रहा है.हालाँकि अक्सर मधेशी पार्टियाँ ब्रहमनवादी विचारधारा रखती हैं. लेकिन वोट के लिए कुछ भी कर गुजरने वाले ये मधेसी नेता दलित,थारू और जनजाति के नाम का खूब प्रयोग कर रहे हैं. ऐसा लगता है कि ये लोग ज़मीनी हकीकत से कोसों दूर हैं.संविधान संशोधन एकमात्र राजनितिक विकल्प बचने के कारण मधेसी पार्टियाँ इसको लेकर कुछ भी करने को तय्यार हैं . हकीकत ये है कि अगर संशोधन बिल न पास हुआ तो मधेसी पार्टियाँ भी मधेस से नापास कर दी जाएँगी.इसीलिए इनकी राजनीती का आखिरी सहारा यह संशोधन विधेयक ही है.इसी कारण एक बार फिर मधेसी जनता डर के आगोश में है.क्यूंकि आगे देश का क्या कुछ होने वाला है इसको लेकर आमजनता असमंजस में है.उसे कुछ समझ में नहीं आरहा है.जावेद आलम खान