Friday, February 24, 2017

नेपाल तब से अब तक....!!!

पिछले केई वर्षों से नेपाल देश विभिन्न कठिनाईयों और प्रतिकूल परिस्तिथियों की मार झेल रहा है. १९९० के दौर में जब दुनिया के अक्सर देश भूमंडलीकरण के माया जाल में खुद को स्थापित करने और एक दुसरे से आगे बढ़ जाने की प्रतिस्पर्धा में लगे हुए थे, क्यूंकि उदारीकरण और निजीकरण नीति बाज़ारों पर दबदबा बनाने के होड़ में था. ऐसे महत्त्वपूर्ण समय में नेपाल राजनितिक उथल पथल का शिकार था.उस दौर में वहां पर राजतन्त्र था. देश में चारो तरफ खुशहाली और तरक्क़ी थी.बल्कि नेपाल को सबसे शांत देश कहा जाता था.बहुत बड़े पैमाने पर टूरिस्ट नेपाल घूमने आते थे.यहाँ तक की नेपाल का सबसे बड़ा इनकम स्रोत पर्यटक ही था. लेकिन शायद पड़ोसी देशों को ये खुशहाली और तरक्क़ी पसंद न आती थी इसलिए उन्होंने राजतन्त्र को उखाड़ फेकने की भरपूर कोशिश की.जिसके नतीजे में वहां १९९० के बाद कभी राजनितिक स्थिरता कायम न रह सकी.देश के राजा  (जिनके साथ जनता का प्यार और आशीर्वाद हमेशा रहता था) हमेशा विभिन्न प्रकार के साजिशों का शिकार बने रहे.

सबसे पहले पूरी दुनिया में अपने वजूद को बरक़रार न रख पाने वाले माओ सिद्धांत का सहारा लिया गया. जिनके प्रतिनिधियों ने सबसे पहले राजनितिक सिस्टम को कमज़ोर करने की कोशिश की.जब यहाँ नाकाम हुए तो जोड़ तोड़ की राजनीती कर राजा को बे दखल करने की साजिश रची.इसके बाद जनता के बीच राजा के खिलाफ नफरत की आग फैलाने की अत्यधिक कोशिश की गयी.जब हर जगह से नाकाम हो गए तब अपने सिद्धांत को अमली जामा पहनाने का प्रयास किया. पूरे देश में आन्दोलन कर सामान्य जीवन और सामान्य परिस्तिथि को उलट कर रख दिया.जब तक राजा वीरेंद्र रहे उनके राजनितिक कुशलता के कारण इनको कामयाबी हाथ न लगी.जब आन्दोलन में भी सफलता न मिली तो पड़ोसी देशों के साथ मिलकर राजा वीरेंद्र को परिवार सहित मार दिया गया.अब नई राजनितिक परिस्तिथि थी. राजा ज्ञानेन्द्र के राजनितिक अनुभव के कमी का पूरा फायदा उठाया गया.देश को ऊपर से हाशिये पर ला खड़ा कर दिया गया .आन्दोलन विद्रोह के शकल में बदल गया.कानूनी व्यस्था महज़ खामूश तमाशाई बना रहा.देश के हर बड़े नेता,कॉर्पोरेट घराने और माओ सिद्धांत के विरोधियों को चुन चुन कर मारा गया,या चंदे के बदले जान न मारने की व्यस्था चलाई गयी.रजा ज्ञानेंद्र ने भरपूर कोशिश की.अपनी झूली में से सभी शक्तियों को बाहर निकाल कर आजमाया.सैनिकों को भी मैदान में भेज दिया.जगह-जगह सैनिक कैंप बनाये गए.कुछ देशों से फौजी और जंगी सामानों की मदद भी ली गयी.लेकिन पडोसी देशों के सामने कुछ भी न चला.इस भयावाहक स्थिति में भारत और चीन ने अपने अपने तौर से विद्रोहियों की मदद की.दोगलेपन और लुका छुपी सिद्धांत का सहारा लिया.आखिरकार मजबूरन राजा को तख़्त छोड़ना पड़ा...भारत और चीन अपने मकसद में कामयाब तो हो गए लेकिन उनके सामने अभी भी बहुत बड़ा चैलेंज था.

अब नेपाल में एक नयी तरह की राजनीती ने जन्म लिया. सैधांतिक राजनीती का दौर शुरू हुआ.माओ सिद्धांत ने एक सशक्त राजनितिक पार्टी का रूप ले लिया.इधर उत्तरी और तराई नेपाल में आर आर एस एस वादियों ने भी बड़ी तेज़ी के साथ नेपाल की राजनीति में महत्त्वपूर्ण स्थान प्राप्त कर लिया.पहले संविधान सभा इलेक्शन में इन दोनों ने बड़ी कामयाबी हासिल की.गठबंधन की सरकार भी इन्ही दोनों ने बनाया.

अब बात संविधान की थी तो यहाँ पर सैंद्धांतिक टकराव का होना सौभाविक था.अब मामला चीन और भारत का था.दोनों ने अपने अपने प्रतिनिधियों को तो संविधान सभा तक पहुंचा दिया था लेकिन एक तरफ कम्युनिस्टवादी दो दोसरी ओर कम्युनलवादी थे.कम्युनिस्टों का झुकाव सवभाविक चीन की तरफ था और RSSS वादियों का भारत की तरफ.चलते चलते इस लड़ाई ने इतना बड़ा रूप ले लिया कि नेपाल देश अपने वजूद को तरसने लगा..दोनों पक्ष अपने अपने जिद में अड़े रहे.RSS वादियों ने मधेस का सहारा लिया और मधेसी दल कहलाये तो कम्युनिस्टों ने राष्ट्रीयता को अपना ढाल बनाया और माओवादी के नाम ने मशहूर हुए.
मामला इस लिए नहीं हल हो पा रहा था क्यूंकि चाइना नेपाल को अपने बाज़ार के रूप में इस्तेमाल करना चाह रहा था ताकि वह नेपाल और भारत के खुले बॉर्डर का पूरा फायदा उठाये.भारत की जासूसी कर भारत से अपनी दुश्मनी का जवाब दे सके.भारत के सामने भी चीन की विदेश नीति थी.भारत पूरी तरह नेपाल के आर्थिक स्रोत पर क़ब्ज़ा जमाये हुए था.वह इसे छोड़ने की स्थिति में नहीं था.लेकिन साथ ही साथ वह नेपाल को एक हिन्दू राष्ट्रीय बनाने के विचार में पूरी ताक़त के साथ मधेसियों को सहारा दिए हुए था..इस लिए दोनों यह चाह रहे थे कि संविधान में ऐसी धाराएं हों जो कभी भी उनके नापाक कोशिशों की कानूनी ढाल न बने....आज भी यही लड़ाई जरी है.


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